बीमा कवरेज घटा, क्लेम अटके; किसानों के लिए फसल बीमा की जमीनी हकीकत
जयपुर: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लेकर राजस्थान से एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है, जहां योजना से जुड़ने वाले किसानों की संख्या में तो बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन बीमित कृषि क्षेत्र का दायरा हर साल सिमटता जा रहा है। लोकसभा में कृषि मंत्रालय द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों के दौरान राज्य में बीमित रकबे में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इसके साथ ही एक और बड़ा खुलासा यह हुआ है कि किसानों, राज्य और केंद्र सरकार द्वारा मिलकर जमा की गई कुल प्रीमियम राशि का लगभग एक-तिहाई हिस्सा किसानों को क्लेम के रूप में वापस नहीं मिल सका है।
संसद में पेश आंकड़े और घटता बीमित कृषि क्षेत्र
कृषि मंत्रालय द्वारा संसद में दिए गए लिखित जवाब के मुताबिक, वर्ष 2021-22 में प्रदेश के कुल बोए गए कृषि क्षेत्र का 39 प्रतिशत हिस्सा फसल बीमा के अंतर्गत आता था, जो वर्ष 2025-26 तक आते-आते घटकर 36 प्रतिशत पर सिमट गया। इस अवधि में बीमित रकबा 107.10 लाख हेक्टेयर से घटकर 101.50 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि राज्य का कुल बोया गया क्षेत्र 275 से 282 लाख हेक्टेयर के बीच स्थिर बना रहा। आंकड़ों से स्पष्ट है कि बीमित क्षेत्र घटा है, हालांकि इसी अवधि में योजना से जुड़ने वाले कृषकों की संख्या 54 लाख से बढ़कर 62.58 लाख तक पहुंच गई है।
प्रदेश के 23 जिलों में बीमित कवरेज में भारी गिरावट
राज्यस्तरीय आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि बीमा कवरेज की यह गिरावट प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में देखने को मिली है। राजस्थान के 33 जिलों में से 23 जिलों में बीमित क्षेत्र के प्रतिशत में कमी आई है, जबकि मात्र 10 जिलों में ही स्थिति सुधरी है। बूंदी और जैसलमेर जिलों में सबसे अधिक 19-19 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, वहीं बीकानेर में 16 प्रतिशत और भीलवाड़ा में 15 प्रतिशत की कमी आई। दूसरी ओर, नागौर जिले में बीमा कवरेज 16 प्रतिशत बढ़कर 47 प्रतिशत पर पहुंचा है, जबकि बाड़मेर और चूरू ही ऐसे दो जिले रहे जहां आधे से अधिक कृषि क्षेत्र का बीमा कराया गया।
हजारों करोड़ रुपये का प्रीमियम और क्लेम का गणित
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में किसानों, राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने मिलकर कुल 26,757.56 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि प्रीमियम के रूप में बीमा कंपनियों को अदा की। इसमें किसानों का योगदान 4,650.78 करोड़, राज्य सरकार का 11,253.68 करोड़ और केंद्र सरकार का 10,853.10 करोड़ रुपये रहा। इसके विपरीत बीमा कंपनियों द्वारा किसानों को केवल 18,189.16 करोड़ रुपये का ही क्लेम दिया गया, जिसका सीधा अर्थ यह है कि कुल जमा प्रीमियम का लगभग 8,568 करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा किसानों को मुआवजे के रूप में प्राप्त नहीं हो सका।
किसान संगठनों के आरोप और सरकार की सफाई
इस पूरे मामले पर किसान संगठनों ने कड़ा रुख अपनाते हुए योजना के मौजूदा स्वरूप पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। किसान प्रतिनिधियों का आरोप है कि जमा प्रीमियम और बांटे गए क्लेम का अंतर यह साबित करता है कि योजना का मुख्य लाभ किसानों के बजाय निजी बीमा कंपनियों को मिल रहा है और किसान आज भी अपनी बकाया राशि के लिए भटक रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, राज्य के कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा है कि केंद्र और राज्य सरकार की प्राथमिकता अधिक से अधिक किसानों को सुरक्षा चक्र प्रदान करना है तथा क्लेम वितरण प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी व समयबद्ध बनाने के लिए लगातार ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।