बांसवाड़ा:बांसवाड़ा-डूंगरपुर क्षेत्र के लोकसभा सांसद राजकुमार रोत ने देश के 10 विभिन्न राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों में निवास करने वाले करोड़ों आदिवासी परिवारों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत यह महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में शहरी स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था को संवैधानिक प्रावधानों के तहत लागू कराने का आग्रह किया गया है। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला डायरी संख्या 42179/2026 के रूप में दर्ज कर लिया गया है, जिसमें भारत सरकार को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है।

सामान्य कानूनों के जरिए नगर निकायों के गठन से आदिवासियों की जमीनों पर मंडरा रहा संकट

याचिका के माध्यम से अदालत के समक्ष यह पक्ष रखा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 243ZC और पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के लिए एक विशेष प्रशासनिक ढांचा निर्धारित है। इसके बावजूद इन क्षेत्रों में शहरी निकायों से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था को आज तक पारदर्शी ढंग से लागू नहीं किया गया। इसके दुष्परिणामस्वरूप राज्य सरकारें सामान्य नगर पालिका अधिनियमों का सहारा लेकर नगर पालिका, नगर परिषद और नगर निगमों का गठन व विस्तार कर रही हैं। इस प्रक्रिया से स्थानीय आदिवासी परिवारों की पारंपरिक और पैतृक जमीनों का अधिग्रहण हो रहा है तथा उन्हें संवैधानिक अधिकारों के वास्तविक लाभों से वंचित होना पड़ रहा है।

संसद में वर्ष 2001 से लंबित मेसा (MESA) विधेयक को लेकर केंद्र सरकार पर उठाए सवाल

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी नगर निकाय के गठन या विस्तार से पूर्व संसद द्वारा मेसा (MESA) कानून पारित किया जाना अनिवार्य है। सांसद राजकुमार रोत ने उजागर किया कि केंद्र सरकार द्वारा 30 जुलाई 2001 को इस संबंध में एक विधेयक संसद में पेश किया गया था, जिसे बाद में स्थायी समिति को भेजा गया था। समिति ने नवंबर 2003 में अपने सुझावों के साथ रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी थी, लेकिन दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह कानून पास नहीं हो सका है। याचिका में शीर्ष अदालत से मांग की गई है कि इस विफलता पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट से मेसा कानून लागू होने तक नगर निकायों के विस्तार पर रोक की मांग

सांसद रोत ने सर्वोच्च न्यायालय से स्पष्ट गुहार लगाई है कि देश के 10 राज्यों में स्थित पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में बिना विशेष कानून के नगर पालिकाओं का सीधा गठन या उनका सीमा विस्तार करना संविधान के अनुच्छेद 244(1) के प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने अदालत से प्रार्थना की है कि जब तक केंद्र सरकार संसद से मेसा (MESA) कानून को विधिवत पारित कर लागू नहीं कर देती, तब तक देश के सभी अनुसूचित क्षेत्रों में नए नगर निकायों के गठन और पुराने निकायों के क्षेत्रीय विस्तार पर पूरी तरह से अंतरिम रोक लगाई जाए।

न्यायालय के संभावित निर्णय से करोड़ों आदिवासियों की लोकतांत्रिक भागीदारी होगी सुदृढ़

इस कानूनी पहल के दूरगामी परिणामों पर बात करते हुए सांसद रोत ने कहा कि यह याचिका किसी एक विशिष्ट क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर के करोड़ों आदिवासियों के स्वाभिमान, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक सहभागिता से जुड़ी हुई है। यदि उच्चतम न्यायालय इस याचिका पर संविधान की मंशा के अनुरूप दिशा-निर्देश जारी करता है, तो वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक अस्पष्टता और विसंगतियां हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगी। इससे जल, जंगल और जमीन पर आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा होगी और उन्हें संविधान द्वारा दी गई स्वायत्तता का वास्तविक लाभ मिल सकेगा।